इंजेक्शन कितने प्रकार के होते हैं?HealthPlanet

Posted on Tue 13th Dec 2022 : 09:44

इंजेक्शन के प्रकार :-

इंट्रावीनस इंजेक्शन (Intravenous injections)
ये इंजेक्शन सीधे नसों या वेंस में डाले जाते हैं जिससे दवा जल्दी खून में मिल जाए. ऐसे इंजेक्शन से उन दवाओं को दिया जाता है जिनकी जरूरत तुंरत पड़ती है. मॉर्फीन जैसे पेन किलर, एंटीबायोटिक्स या फिर एंटी फंगल एजेंट्स को इस तरह के इंजेक्शन से दिया जाता है.

इंट्रामस्क्युलर इंजेक्शन (Intramuscular injections)
इस इंजेक्शन से मांसपेशियों में दवा पहुंचाई जाती है. कोविड-19 वैक्सीन इसी इंजेक्शन का एक उदाहरण है. मांसपेशियों में खून लगातार और तेज धार में बहता रहता है. ऐसे में इसमें दवा डालकर उसे स्थिर गति से पूरे शरीर में पहुंचाया जाता है. इसी के जरिए दवा की ज्यादा मात्रा भी दी जा सकती है क्योंकि खून का बहाव तेज होता है. इससे मरीज को दवा का असर तुरंत नहीं होगा और उसे शॉक नहीं लगेगा. दवा की डोज के हिसाब से मांसपेशियों की जगह को चुनते हैं. इन्हीं इंजेक्शन को बाजुओं के अलावा, हिप या जांघों पर दिया जाता है जहां मांसपेशियां ज्यादा होती हैं.

सबक्यूटेनियस इंजेक्शन (Subcutaneous injections)
इस इंजेक्शन को स्किन की सबसे आखिरी लेयर में लगाया जाता है. इसका प्रमुख उदाहरण है डायबिटीज के मरीज को इंस्युलिन देना. इन इंजेक्शन्स के लिए लंबी नीडल की जरूरत नहीं पड़ती है क्यों कि इन्हें सिर्फ इनर स्किन लेयर के फैटी टिशू को पार करना होता है. ये इंजेक्शन दवा के छोटे भाग को देने में मदद करते हैं, जैसे महज हॉर्मोन की कुछ बूंदें. सबक्यूटेनियस टिशू में में धमनियां ज्यादा नहीं होती हैं. इस कारण इनमें इंजेक्शन लगाने से हॉर्मोन बेहद धीमी और स्थिर गति से शरीर में प्रवेश करते हैं. इसे खून में इंसुलिन का लेवल धीरे-धीरे मैनेज होता है. डायबिटीज के मरीज आमतौर पर इंस्युलिन पेन को अपनी कमर में लगाते हैं. इस दौरान वो स्किन को पिंच करते हैं जिससे फैटी टिशू और मांसपेशियां एक दूसरे से अलग हो जाएं.

इंट्राडर्मल इंजेक्शन (Intradermal injections)
ये इंजेक्शन स्किन की दूसरी या बीच की लेयर में दिए जाते हैं जिसे डर्मिस के नाम से जाना जाता है. ये इंजेक्शन दवाएं या सप्लिमेंट पुहंचाने के लिए नहीं इंजेक्ट किए जाते हैं. इनकी नीडल 1 इंच से छोटी होती है और ये शरीर को कुछ ही हद तक चीरते हैं. टीबी के टेस्ट के दौरान इस तरह की सूई लगाई जाती है. ये इंजेक्शन फोरआर्म में लगाए जाते हैं, यानी कलाई से लेकर कोहनी के बीच में. इनसे इंजेक्ट किए जाने वाले पदार्थ, जैसे एलर्जेन या ट्यूबरक्यूलिन प्रोटीन को डालकर देखा जाता है कि शरीर में कोई रैश या रेड पैच तो नहीं हो गया. इससे पता चलता है कि शरीर एलर्जेन से कैसे रिएक्ट करता है.

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